दीपावली के पांच दिन: धनतेरस से भाई दूज तक
दीपावली सिर्फ एक दिन नहीं है। यह पांच दिनों का उत्सव है, जिसमें हर दिन का अपना अर्थ और परंपरा है।

Sunil Chaurasia
3 नवंबर 2026 • 5 मिनट
दीपावली के पांच दिन हिंदू परंपरा के सबसे महत्वपूर्ण समय को चिह्नित करते हैं। कार्तिक महीने की अमावस्या के आसपास मनाए जाते हैं ये पांच दिन, जिनमें हर दिन का अपना कहानी, देवता और रीति-रिवाज है। पहले दिन धनतेरस से शुरू होकर पांचवें दिन भाई दूज तक, यह पूरा चक्र बुराई पर अच्छाई की जीत, समृद्धि, भाई-बहन के रिश्ते और परिवार के महत्व को दर्शाता है।
धनतेरस: धन का त्योहार
धनतेरस दीपावली का पहला दिन है, जिसे धन और समृद्धि का दिन माना जाता है। इसी दिन देवताओं ने समुद्र मंथन से 13 रत्नों को निकाला था। इन 13 रत्नों में धन्वंतरि भी प्रकट हुए थे, जो आयुर्वेद और चिकित्सा के देव माने जाते हैं।
धनतेरस पर नए बर्तन, गहने और धातु की चीजें खरीदना शुभ माना जाता है। घरों में दीये जलाए जाते हैं और लक्ष्मी माता को प्रणाम किया जाता है। व्यापारी और दुकानदार इस दिन अपनी बहियों की पूजा करते हैं। घर में नई चीजें आने से नकारात्मकता दूर होती है और सकारात्मक ऊर्जा का आगमन होता है, ऐसा विश्वास है।
नरक चतुर्दशी: बुराई पर विजय
दीपावली के दूसरे दिन को नरक चतुर्दशी या छोटी दिवाली कहा जाता है। इस दिन भगवान कृष्ण ने राक्षस नरकासुर का वध किया था। कहा जाता है कि नरकासुर ने 16,000 कन्याओं को बंदी बनाया हुआ था। कृष्ण ने इन सभी को मुक्त किया।
इस दिन घरों में घी से बने दीये जलाए जाते हैं और माना जाता है कि इससे घर में बुराई दूर होती है। तेल से स्नान करने की परंपरा भी इसी दिन से जुड़ी है। यह प्रतीकात्मक रूप से अंधकार को समाप्त करने और आंतरिक अंधकार को दूर करने का प्रतीक है। कुछ जगहों पर इसे दिवाली से एक दिन पहले मनाया जाता है।
दिवाली: प्रकाश का पर्व
कार्तिक अमावस्या की रात को दिवाली मनाई जाती है। यह दीपावली के पांच दिनों का सबसे प्रमुख दिन है। इसी दिन भगवान राम 14 साल का वनवास काट कर अयोध्या लौटे थे। इसी दिन देवी लक्ष्मी का जन्म हुआ था समुद्र मंथन से।
दिवाली की रात घरों में दीये जलाए जाते हैं, रंगोली बनाई जाती है, और लक्ष्मी पूजन किया जाता है। परिवार के सभी सदस्य एक साथ बैठते हैं। मिठाई बनाई जाती है, उपहार दिए जाते हैं और पटाखे छोड़े जाते हैं। यह प्रकाश, शुद्धता और नई शुरुआत का प्रतीक है।
गोवर्धन पूजा: पशु और प्रकृति का आशीर्वाद
दिवाली के दूसरे दिन गोवर्धन पूजा मनाई जाती है। इसे अन्नकूट भी कहते हैं। इसी दिन भगवान कृष्ण ने गोवर्धन पर्वत को अपनी छोटी उंगली पर उठाया था। इंद्र की बारिश से गायों, गोपियों और गांव के लोगों को बचाया था।
गोवर्धन पूजा पर गाय और गोबर का विशेष महत्व है। घरों में गोबर से गोवर्धन पर्वत का आकार बनाया जाता है और उसकी पूजा की जाती है। गायों को खीर और रोटी खिलाई जाती है। यह दिन पशुपालन, प्रकृति और कृषि के महत्व को दर्शाता है। कुछ क्षेत्रों में इसे मारु-भ्रमण भी कहा जाता है, जहां गांव भर में गोवर्धन की पूजा की परिक्रमा की जाती है।
भाई दूज: रिश्तों की पूर्णता
दीपावली के पांचवें और आखिरी दिन को भाई दूज कहा जाता है। इसी दिन यमराज और यमुना की कहानी जुड़ी है। कहा जाता है कि यमुना ने अपने भाई यमराज को अपने घर आने के लिए आमंत्रित किया था। यमराज ने अपनी बहन को इच्छामृत्यु का वरदान दिया था।
भाई दूज पर बहनें अपने भाइयों के माथे पर तिलक लगाती हैं और उनकी लंबी उम्र की कामना करती हैं। भाई अपनी बहनों की रक्षा का वचन देते हैं। यह परंपरा भाई-बहन के स्नेह और संरक्षण को दर्शाती है। इसी दिन से दीपावली का पांच दिनों का महान पर्व समाप्त होता है।
दीपावली के ये पांच दिन सिर्फ धार्मिक अनुष्ठान नहीं हैं। ये हमारे जीवन के मूल्यों को दोहराते हैं - धन का सही उपयोग, बुराई को दूर करना, रिश्तों को महत्व देना, पशु-पालन और प्रकृति से जुड़ाव। हर दिन एक अलग संदेश लेकर आता है, और पूरे पांच दिन मिलकर एक सम्पूर्ण और संतुलित जीवन का चित्र प्रस्तुत करते हैं।
सामान्य प्रश्न
क्या दीपावली का पांचों दिन हर साल एक जैसे तारीख को आते हैं?
नहीं। दीपावली के दिन हर साल बदलते हैं क्योंकि ये चंद्र कैलेंडर के अनुसार मनाए जाते हैं। दीपावली कार्तिक महीने की अमावस्या को आती है, जो ग्रेगोरियन कैलेंडर में अक्टूबर या नवंबर में हो सकती है।
क्या भाई दूज सिर्फ भाई-बहन के लिए है, अगर कोई अकेला हो?
भाई दूज का मूल भावना भाई-बहन के रिश्ते का उत्सव है। अगर किसी के भाई नहीं हैं, तो कुछ परिवारों में चचेरे भाई, दामाद या घनिष्ठ मित्रों को भाई का स्थान दिया जाता है। कुछ जगहों पर बहनें अपने पति या पिता को तिलक लगाती हैं।
अलग-अलग राज्यों में दीपावली के ये पांच दिन अलग तरीके से मनाए जाते हैं?
हां। उत्तर भारत में दिवाली पर राम की अयोध्या वापसी मनाई जाती है, जबकि दक्षिण भारत के कुछ हिस्सों में कृष्ण की नरकासुर विजय को प्रमुखता मिलती है। गोवा में दिवाली से पहले समुद्र की पूजा की जाती है। बंगाल में काली पूजन होता है। रीतियां अलग हों, पर उद्देश्य एक ही है - अंधकार पर प्रकाश की जीत।


