
दिवाली 2026: तिथि और लक्ष्मी पूजा मुहूर्त
| तारीख | रविवार, 8 नवंबर 2026 |
|---|---|
| प्रदोष काल | शाम 5:41 – रात 8:17 |
| लक्ष्मी पूजा मुहूर्त | शाम 6:09 – रात 8:07 |
| निशीथ काल | रात 11:45 – रात 12:37, 9 नवंबर |
| शाम के चौघड़िया (शुभ, अमृत, चर) | शाम 5:41 – रात 10:34 |
समय उज्जैन के लिए IST में हैं।
इस पेज पर: दिवाली का महत्व · दिवाली की कथा · घर पर दिवाली की लक्ष्मी पूजा कैसे करें · दिवाली पूजा सामग्री · क्षेत्रीय परंपराएँ · दिवाली के पाँच दिन · बंगाल की दिवाली: काली पूजा · दिवाली की तिथियाँ · अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न
दिवाली 2026: 8 या 9 नवंबर?
दिवाली 2026 रविवार, 8 नवंबर को है। उज्जैन में अमावस्या तिथि 8 नवंबर को प्रदोष काल (सूर्यास्त के बाद का समय) में रहती है। 9 नवंबर को यह दोपहर 12:32 बजे, सूर्यास्त से पहले, समाप्त हो जाती है।
दिवाली के बारे में
पाँच दिन अलग-अलग पौराणिक कथाओं को एक सूत्र में पिरोते हैं। धनतेरस धन्वंतरि को समर्पित है, जो उसी मंथन से अमृत का कलश लेकर निकले थे — इसीलिए लोग धातु की वस्तुएँ खरीदते हैं, जो उस समृद्धि का पात्र मानी जाती हैं। नरक चतुर्दशी में कृष्ण द्वारा राक्षस नरकासुर के वध की स्मृति है; इस दिन की मुख्य परंपरा है तिल के तेल और उबटन से भोर से पहले अभ्यंग स्नान। अमावस्या की रात अधिकांश भारत में लक्ष्मी पूजा होती है, लेकिन बंगाल, ओडिशा और असम में उसी रात काली पूजा होती है — काली, जो देवी महात्म्य में दुर्गा के माथे से प्रकट होकर रक्तबीज का वध करती हैं। गोवर्धन पूजा कृष्ण द्वारा पर्वत उठाने की स्मृति में मनाई जाती है; यह गुजराती नव वर्ष भी है। भाई दूज से चक्र पूरा होता है — बहनें भाइयों की लंबी उम्र के लिए पूजा करती हैं। सिख इसी रात को बंदी छोड़ दिवस के रूप में मनाते हैं, जब गुरु हरगोबिंद ग्वालियर किले से मुक्त हुए थे।
दिवाली का महत्व
दीपावली का अर्थ है दीपों की पंक्ति, और इस रात का सार भी यही है: हर द्वार, हर खिड़की और छत की हर मुंडेर पर एक लौ जलती है। पाँच दिन के इस पर्व का तीसरा और मुख्य दिन लक्ष्मी पूजा का होता है। उत्तर और पश्चिम भारत के अधिकांश भागों में इसी दिन को दिवाली कहा जाता है।
उत्तर भारत में यह रात श्रीराम के अयोध्या लौटने की याद दिलाती है, जब वे चौदह वर्ष के वनवास और रावण-वध के बाद सीता, लक्ष्मण और हनुमान के साथ घर आए। व्यापारी परिवारों के लिए इसी दिन से नया वित्तीय वर्ष भी शुरू होता है। नए बही-खाते लक्ष्मी जी के सामने खोले जाते हैं, ताकि साल भर का कारोबार उनके आशीर्वाद से आरंभ हो।
यह पर्व अमावस्या को पड़ता है, इसलिए दिन अपने आप में शांत रहता है। कुछ परिवार इस अमावस्या पर अपने पितरों को भी याद करते हैं, और कुछ लोग सांझ तक व्रत रखते हैं। आतिशबाज़ी, परिवार के साथ भोजन और बड़ों से मिलने जाना, यह सब शाम की पूजा के बाद ही होता है।
दूसरी परंपराएँ भी यही रात मनाती हैं। जैन समाज इस रात चौबीसवें तीर्थंकर भगवान महावीर के निर्वाण की स्मृति में अपने दीप जलाता है।
दिवाली की कथा
जब क्षीर सागर का मंथन हुआ, तब उसमें से लक्ष्मी जी प्रकट हुईं और उन्होंने भगवान विष्णु को अपना पति चुना। लोक परंपरा इनके मिलन को दिवाली की रात से जोड़ती है। इसलिए यह पूजा उनका स्वागत विष्णु की अर्धांगिनी के रूप में भी करती है और उस देवी के रूप में भी, जो हर साफ़-सुथरे, जगमगाते और तैयार घर को समृद्धि देती हैं।
इसके साथ-साथ रामायण की कथा भी चलती है। रावण के पतन के बाद श्रीराम अयोध्या लौटे, और लोक कथाओं के अनुसार नगरवासियों ने अपने राजा के स्वागत में दीपों की पंक्तियाँ जलाईं। जब परिवार देहरी पर दीये सजाते हैं, तो बहुतों के मन में यही स्वागत होता है।
घर पर दिवाली की लक्ष्मी पूजा कैसे करें
- घर तैयार करें घर की सफ़ाई करें, प्रवेश द्वार पर रंगोली बनाएँ और गेंदे के फूलों व आम के पत्तों का तोरण लगाएँ। कुछ परिवार द्वार पर कलश भी रखते हैं।
- दिन का नियम कुछ लोग शाम की पूजा तक व्रत रखते हैं; पूरा उपवास कठिन हो तो फल या दूध ले सकते हैं। जो बीमार हैं, गर्भवती हैं या नियमित दवा लेते हैं, वे सामान्य भोजन करें।
- पूजा की चौकी सजाएँ एक ऊँची चौकी पर लाल कपड़ा बिछाकर लक्ष्मी जी और गणेश जी को विराजमान करें। उनके पास जल से भरा कलश, आम के पत्ते और नारियल रखें, साथ में सिक्के, आभूषण और व्यापारी हों तो नए बही-खाते, कलम और दवात भी रखें।
- संकल्प लें ऊपर दिया गया मुहूर्त शुरू होते ही हाथ-पैर धोकर चौकी की ओर मुख करके बैठें। जल की कुछ बूँदों से स्वयं को पवित्र करें और परिवार की कुशलता के लिए संकल्प लें।
- गणेश पूजन सबसे पहले गणेश जी की पूजा जल, कुमकुम, अक्षत (साबुत चावल), दूर्वा और फूलों से करें, और लड्डू या कोई और मिठाई अर्पित करें।
- लक्ष्मी पूजन लक्ष्मी जी के चरण पखारने के लिए जल अर्पित करें और मूर्ति हो तो पंचामृत से स्नान कराएँ, चित्र हो तो पंचामृत की कुछ बूँदें छिड़कें। फिर लाल वस्त्र, कुमकुम, अक्षत, फूल, धूप और घी का दीपक चढ़ाएँ। यदि आते हों तो उनके नामों का जाप या श्री सूक्त का पाठ करें।
- बही-खाते और तिजोरी का पूजन पारंपरिक घरों में कलम-दवात की पूजा की जाती है, नए बही-खाते में सरस्वती जी की और गल्ले या तिजोरी में कुबेर जी की पूजा होती है। दूसरे परिवार घर की जमा-पूँजी ही लक्ष्मी जी के सामने रख देते हैं।
- दीपों की पंक्ति जलाएँ पूजा के दीपक से बाकी दीये जलाएँ और उन्हें देहरी, खिड़कियों, बालकनी और छत की मुंडेर पर सजाएँ। दीप जलाने के इस चरण को दीपमालिका पूजन कहते हैं।
- आरती और प्रसाद लक्ष्मी जी की आरती गाएँ, मिठाई, खील, बताशे और फल का भोग लगाएँ और पूजा में हुई किसी भी भूल के लिए क्षमा माँगें। फिर प्रसाद पूरे परिवार में बाँटें।
- रात भर दीपक जलाए रखें पूजा के दीपक में घी या तेल डालते रहें ताकि वह सुबह तक जले, और हो सके तो रात का कुछ समय लक्ष्मी स्तोत्र पढ़ने में बिताएँ। परदों के पास या जहाँ बच्चे खेलते हों, वहाँ जलती लौ को कभी अकेला न छोड़ें।
दिवाली पूजा सामग्री
- लक्ष्मी जी और गणेश जी की मूर्ति या चित्र
- लकड़ी की चौकी और लाल कपड़ा
- जल से भरा कलश, आम के पत्ते और नारियल
- पंचामृत: दूध, दही, घी, शहद और शक्कर
- कुमकुम, हल्दी और चंदन
- अक्षत (साबुत चावल)
- कमल या गेंदे के फूल और मालाएँ
- दूर्वा, बेलपत्र और तुलसी दल
- अगरबत्ती और कपूर
- चौकी के लिए घी का बड़ा दीपक
- घर के लिए मिट्टी के दीये, तेल और रुई की बत्तियाँ
- नैवेद्य के लिए खील, बताशे, मिठाई और फल
- गन्ना
- पान के पत्ते, सुपारी और इलायची
- पूजा के लिए सिक्के, आभूषण या नकद
- नए बही-खाते, कलम और दवात (व्यापारियों के लिए)
- गेंदे और आम के पत्तों का तोरण
- रंगोली के लिए चावल का आटा और रंग
क्षेत्रीय परंपराएँ
- गुजरात
- व्यापारी परिवार चोपड़ा पूजन करते हैं, जिसमें लक्ष्मी जी के सामने नए बही-खाते खोले जाते हैं। गुजराती नव वर्ष इसके बाद आने वाली प्रतिपदा से शुरू होता है।
- महाराष्ट्र
- लक्ष्मी पूजन शाम को होता है। इसके बाद, प्रायः अगले दिन, दिवाली पाडवा या बलि प्रतिपदा आती है। इसमें राजा बलि को याद किया जाता है और पति-पत्नी के रिश्ते का सम्मान होता है।
- तमिलनाडु
- मुख्य उत्सव, यानी भोर का तेल-स्नान, नए कपड़े और पटाखे, नरक चतुर्दशी की सुबह होता है। कुछ तमिल परिवार नोम्बु (व्रत) रखते हैं और लक्ष्मी पूजा करते हैं।
- कर्नाटक
- दीपावली नरक चतुर्दशी के तेल-स्नान से शुरू होकर बलि पाड्यमी तक चलती है, जब कई गाँवों में मवेशियों को सजाकर उनकी पूजा की जाती है।
- नेपाल
- यहाँ यह पर्व तिहार कहलाता है, और इसके लक्ष्मी पूजा वाले दिन को गाई तिहार भी कहते हैं।
दिवाली के पाँच दिन
दिवाली कृष्ण पक्ष की त्रयोदशी से शुक्ल पक्ष की द्वितीया तक चलती है। जब कोई तिथि दिन के बीच में शुरू या समाप्त होती है, तो दो पर्व एक ही तारीख पर पड़ सकते हैं। दिवाली के पाँच दिनों पर हमारा लेख हर दिन के बारे में अलग से बताता है।
- धनतेरस: परिवार धातु की वस्तुएँ और घर के लिए नई चीज़ें ख़रीदते हैं, लक्ष्मी, कुबेर और धन्वंतरि की पूजा करते हैं और यमराज के लिए घर के बाहर एक दीपक रखते हैं।
- नरक चतुर्दशी (छोटी दिवाली): सूर्योदय से पहले का तेल-स्नान श्रीकृष्ण की नरकासुर पर विजय की याद दिलाता है। तमिलनाडु में दीपावली इसी सुबह मनाई जाती है; कर्नाटक और गोवा में इसी से पर्व की शुरुआत होती है।
- लक्ष्मी पूजा: अमावस्या की रात और पर्व का मुख्य दिन। शाम को लक्ष्मी जी और गणेश जी की पूजा होती है और पूरा घर रोशन किया जाता है, जबकि बंगाल, ओडिशा और असम में इस रात काली पूजा होती है।
- गोवर्धन पूजा (अन्नकूट): श्रीकृष्ण को अन्न का पर्वत (अन्नकूट) चढ़ाया जाता है और गोवर्धन की प्रतिकृति बनाकर उनका पूजन होता है। यही दिन बलि प्रतिपदा है और गुजरात में नया साल भी।
- भाई दूज: यमुना ने अपने भाई यमराज का जो स्वागत किया था, उसकी याद में बहनें भाइयों को तिलक लगाती हैं, आरती उतारती हैं और भोजन कराती हैं।
बंगाल की दिवाली: काली पूजा
बंगाल, ओडिशा, असम और त्रिपुरा में दिवाली की अमावस्या की रात माँ काली को समर्पित होती है, जिन्हें श्यामा रूप में पूजा जाता है और यह पूजा देर रात तक चलती है। परिवार और मोहल्ले की समितियाँ देवी की मिट्टी की प्रतिमाएँ स्थापित करती हैं। लाल गुड़हल उनका प्रिय फूल है, और उन्हें चावल, दाल और मिठाई का भोग लगाया जाता है।
भूत चतुर्दशी पर, जो प्रायः एक शाम पहले पड़ती है, परिवार अपने चौदह पूर्वजों के लिए चौदह दीये जलाते हैं।
बंगाल में यह रात हमेशा से काली की नहीं थी। पुराने विवरणों में इसकी जगह लक्ष्मी पूजा, दीपों और नए बही-खातों का उल्लेख मिलता है। दिवाली पर काली पूजा का चलन अठारहवीं सदी के मध्य से नदिया के राजा कृष्णचंद्र जैसे राजाओं के संरक्षण में फैला। बड़े सार्वजनिक उत्सव का रूप इसने पिछले लगभग सौ वर्षों में ही लिया।
दोनों पूजाएँ आज भी साथ-साथ चलती हैं। कोलकाता के कालीघाट में इस रात काली के साथ लक्ष्मी जी की भी पूजा होती है।
दिवाली की तिथियाँ
| दिन | तारीख |
|---|---|
| रविवार | 8 नवंबर 2026 |
| शुक्रवार | 29 अक्टूबर 2027 |
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अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न
दिवाली 2026 का समय क्या है?
प्रदोष काल: शाम 5:41 – रात 8:17; निशीथ काल: रात 11:45 – रात 12:37, 9 नवंबर; शाम के चौघड़िया (शुभ, अमृत, चर): शाम 5:41 – रात 10:34। समय उज्जैन के लिए IST में हैं।
दिवाली कब है और यह किस तिथि को मनाई जाती है?
दिवाली की लक्ष्मी पूजा अमावस्या की रात होती है, जो पाँच दिन के दीपोत्सव का तीसरा और मुख्य दिन है। इस साल की तारीख और पूजा मुहूर्त इसी पेज पर दिए गए हैं।
छोटी दिवाली और बड़ी दिवाली में क्या अंतर है?
छोटी दिवाली नरक चतुर्दशी है, जब सूर्योदय से पहले तेल-स्नान करके श्रीकृष्ण की नरकासुर पर विजय को याद किया जाता है। बड़ी दिवाली अमावस्या की रात की लक्ष्मी पूजा है, जब लक्ष्मी जी और गणेश जी की पूजा होती है और पूरा घर दीयों से जगमगाता है। तिथियों के कारण कुछ वर्षों में दोनों एक ही तारीख पर पड़ती हैं।
दिवाली की लक्ष्मी पूजा में किन देवताओं की पूजा होती है?
मुख्य रूप से लक्ष्मी जी और गणेश जी की, और पहले गणेश जी की पूजा की जाती है। पारंपरिक घरों में बही-खातों में सरस्वती जी और तिजोरी में कुबेर जी का भी पूजन होता है।
क्या बिना पंडित के घर पर लक्ष्मी पूजा कर सकते हैं?
हाँ। साफ़ चौकी, संकल्प, फिर गणेश जी और लक्ष्मी जी की फूल, दीपक और मिठाई से पूजा, और अंत में आरती, इतने से पूजा पूरी हो जाती है। हर मंत्र जानने से अधिक ज़रूरी है कि मुहूर्त में पूरी श्रद्धा से पूजा की जाए।
क्या दिवाली का दीपक पूरी रात जलना चाहिए?
परंपरा यही है कि पूजा का दीपक सुबह तक जलता रहे, ताकि लक्ष्मी जी को घर रोशन मिले। पर्याप्त घी या तेल वाला बड़ा दीपक लें, उसे धातु की थाली में रखें और कपड़े से दूर रखें। कई परिवार रात का कुछ समय लक्ष्मी स्तोत्र पढ़ने में भी बिताते हैं।
तमिलनाडु में दीपावली नरक चतुर्दशी की सुबह क्यों मनाई जाती है?
तमिलनाडु और दक्षिण भारत के बड़े हिस्से में दीपावली का केंद्र श्रीकृष्ण की नरकासुर पर विजय है, जिसे नरक चतुर्दशी की सुबह याद किया जाता है। यह चतुर्दशी दिवाली से पहले की चतुर्दशी है, जो कुछ वर्षों में दिवाली की ही तारीख पर पड़ती है। भोर का तेल-स्नान, नए कपड़े और पटाखे सब उसी समय होते हैं। अमावस्या की शाम को लक्ष्मी पूजा भी कुछ परिवार करते हैं।
दिवाली पर काली पूजा कहाँ होती है?
बंगाल, ओडिशा, असम और त्रिपुरा में दिवाली की अमावस्या की रात माँ काली की पूजा होती है, जो देर रात तक चलती है। कोलकाता के कालीघाट में इसी रात काली के साथ लक्ष्मी जी की भी पूजा होती है।
व्यापारी दिवाली पर नए बही-खाते की पूजा क्यों करते हैं?
कई व्यापारी समुदायों के लिए, खासकर गुजरात में, दिवाली से कारोबार का नया साल शुरू होता है। चोपड़ा पूजन नाम की विधि में नए बही-खाते लक्ष्मी जी के सामने खोलकर पूजे जाते हैं, ताकि साल की हर प्रविष्टि उनके आशीर्वाद से शुरू हो।
क्या दिवाली पर व्रत रखना ज़रूरी है?
नहीं। कुछ भक्त शाम की पूजा तक पूरा उपवास या फल और दूध लेकर व्रत रखते हैं, पर यह व्यक्तिगत संकल्प है। बच्चे, बुज़ुर्ग और बीमार लोग सामान्य भोजन करें; वे भी पूजा कर सकते हैं।


