
नरक चतुर्दशी (छोटी दिवाली) 2026: तिथि और अभ्यंग स्नान समय
| तारीख | रविवार, 8 नवंबर 2026 |
|---|---|
| अभ्यंग स्नान | सुबह 5:39 – सुबह 6:36 |
समय उज्जैन के लिए IST में हैं।
इस पेज पर: नरक चतुर्दशी (छोटी दिवाली) का महत्व · नरक चतुर्दशी (छोटी दिवाली) की कथा · घर पर नरक चतुर्दशी का स्नान और पूजा कैसे करें · नरक चतुर्दशी (छोटी दिवाली) पूजा सामग्री · क्षेत्रीय परंपराएँ · अलग-अलग क्षेत्रों में नाम · अभ्यंग स्नान · नरक चतुर्दशी (छोटी दिवाली) की तिथियाँ · अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न
नरक चतुर्दशी (छोटी दिवाली) 2026: 7 या 8 नवंबर?
नरक चतुर्दशी (छोटी दिवाली) 2026 रविवार, 8 नवंबर को है। अभ्यंग स्नान सूर्योदय से पहले, चंद्रोदय से सूर्योदय तक, चतुर्दशी तिथि में किया जाता है। उज्जैन में चतुर्दशी तिथि 7 नवंबर को सुबह 10:48 बजे से 8 नवंबर को सुबह 11:28 बजे तक है, इसलिए यह समय 8 नवंबर की सुबह आता है।
नरक चतुर्दशी (छोटी दिवाली) का महत्व
नरक चतुर्दशी कृष्ण पक्ष की चौदहवीं तिथि को पड़ती है। अधिकतर वर्षों में यह लक्ष्मी पूजा से एक दिन पहले आती है, पर कुछ वर्षों में दोनों एक ही दिन पड़ती हैं। इसके नाम में दो शब्द हैं: नरक, यानी मृत्यु के बाद कष्ट का लोक, और चतुर्दशी, यानी चौदहवीं तिथि। इस दिन किया जाने वाला लगभग हर कर्म उसी कष्ट से मुक्ति की प्रार्थना है, अपने लिए भी और अपने पितरों के लिए भी।
सुबह का समय तेल-स्नान का है और शाम दीयों की। बीच के समय में परिवार मिठाइयाँ बनाते हैं, रिश्तेदारों से मिलने जाते हैं और दिवाली की मुख्य रात के लिए घर सजाते हैं। कर्नाटक और गोवा में यही भोर का स्नान दीपावली पर्व की शुरुआत करता है।
इस दिन पितरों और यमराज का भी स्मरण किया जाता है। कुछ परिवार अपने पितरों के लिए प्रार्थना करते हैं और उन्हें राह दिखाने के लिए दीये जलाते हैं। स्नान के बाद बहुत से लोग यम के नाम लेते हुए उन्हें जल अर्पित करते हैं, और चतुर्दशी की शाम उनके लिए एक दीया रखा जाता है। यह प्रार्थना धनतेरस के यम दीपक जैसी ही है: अकाल मृत्यु से और नरक के भय से रक्षा।
नरक चतुर्दशी (छोटी दिवाली) की कथा
नरकासुर एक असुर राजा था, जो शक्ति के मद में देवताओं और मनुष्यों, दोनों को सताता था। उसके अपराधों में यह भी था कि उसने सोलह हज़ार स्त्रियों को बंदी बना रखा था। श्रीकृष्ण सत्यभामा को साथ लेकर उससे युद्ध करने गए, और इसी चतुर्दशी को नरकासुर का वध हुआ।
बंदी स्त्रियाँ मुक्त कर दी गईं। इसके बाद श्रीकृष्ण अपनी बहन सुभद्रा से मिलने गए, जिन्होंने मिठाई, फूल और तिलक से उनका स्वागत किया। कुछ लोग भाई दूज की परंपरा को इसी भेंट से जोड़ते हैं।
घर पर नरक चतुर्दशी का स्नान और पूजा कैसे करें
- एक रात पहले तैयारी तिल का तेल, उबटन (आमतौर पर बेसन से बना जड़ी-बूटियों का लेप) और साफ़ या नए कपड़े निकालकर रख लें। बहुत से माध्व और दूसरे दक्षिण भारतीय घरों में स्नान के जल का पात्र भी सजाया जाता है।
- सूर्योदय से पहले उठें ऊपर दिए गए मुहूर्त में उठें, जब अभी अँधेरा हो और चतुर्दशी तिथि चल रही हो। कुलदेवता के आगे दीया जलाएँ।
- तेल मालिश गुनगुना तिल का तेल सिर और शरीर पर मलें। दक्षिण भारत के कई घरों में पहले देवता को अर्पित किया गया तेल परिवार के हर सदस्य के सिर पर लगाया जाता है, और सबसे बड़े सदस्य पहले स्नान करते हैं।
- उबटन और अपामार्ग उबटन लगाएँ। कुछ परिवार स्नान करते समय अपामार्ग (चिरचिटा) की टहनी सिर के चारों ओर घुमाते हैं और प्रार्थना करते हैं कि पाप और नरक का भय दूर हो।
- सूर्योदय से पहले स्नान पूरा करें गुनगुने जल से स्नान करें, सूरज निकलने से पहले स्नान पूरा कर लें और नए या धुले हुए कपड़े पहनें।
- यम तर्पण दक्षिण दिशा की ओर मुख करके अंजलि से जल अर्पित करें और यम के नाम, जैसे यम, धर्मराज, मृत्यु और चित्रगुप्त, तीन-तीन बार लें। कुछ लोग भीष्म को भी जल देते हैं। जल में चावल या तिल मिलाने को लेकर परिवारों की रीति अलग-अलग है, इसलिए अपने घर की परंपरा मानें।
- प्रातः पूजा फूल, धूप और दीपक से श्रीकृष्ण की पूजा करें और मिठाई का भोग लगाएँ। कुछ परिवार हनुमान जी को नारियल और तिल, गुड़ व पोहे का प्रसाद भी चढ़ाते हैं, या अपनी कुलदेवी की पूजा करते हैं।
- काजल और दिन भर की मिठाइयाँ कुछ क्षेत्रों में स्नान के बाद आँखों में काजल लगाया जाता है, इस विश्वास के साथ कि यह बुरी नज़र से बचाता है। बाकी दिन दिवाली की रात से पहले मिठाइयाँ बनाने और रिश्तेदारों से मिलने में बीतता है।
- शाम को यम का दीया चतुर्दशी की शाम, अपने परिवार के पंचांग के अनुसार, घर के बाहर यम के लिए चार बत्तियों वाला दीया जलाएँ। कहा जाता है कि ये चार बत्तियाँ धर्म, अर्थ, काम और मोक्ष की प्रतीक हैं।
- पूरे घर में दीये जलाएँ रसोई में, पानी के स्रोत के पास, गौशाला हो तो वहाँ, और घर के अँधेरे कोनों में दीये जलाएँ। हर लौ को कपड़ों से दूर और बच्चों की पहुँच से बाहर रखें।
नरक चतुर्दशी (छोटी दिवाली) पूजा सामग्री
- गुनगुना किया हुआ तिल का तेल
- बेसन और जड़ी-बूटियों का उबटन
- अपामार्ग की एक टहनी
- गुनगुना जल और स्नान के लिए साफ़ पात्र
- नए या धुले हुए कपड़े
- पूजा स्थान के लिए छोटा दीपक
- तर्पण के लिए जल भरा तांबे का लोटा
- तर्पण के लिए तिल या अक्षत, घर की परंपरा के अनुसार
- यम के लिए चार बत्तियों वाला मिट्टी का दीया
- मिट्टी के दीये, तेल और रुई की बत्तियाँ
- श्रीकृष्ण का चित्र या मूर्ति
- फूल, अगरबत्ती और कपूर
- नैवेद्य के लिए मिठाई और पोहे के व्यंजन
- हनुमान जी के लिए नारियल, जिन परिवारों में यह चढ़ाया जाता है
क्षेत्रीय परंपराएँ
- गोवा
- मोहल्लों में नरकासुर के ऊँचे-ऊँचे पुतले बनाए जाते हैं और भोर से पहले उनका दहन होता है। घर लौटकर परिवार स्नान करते हैं, असुर की हार के प्रतीक के रूप में कड़वा कारीट पैर से कुचलते हैं, और कई तरह से बना पोहा खाते हैं।
- तमिलनाडु
- यहाँ यही सुबह दीपावली है। देवता को अर्पित किया गया तेल लगाकर भोर से पहले स्नान होता है, जिसे अक्सर गंगा स्नानम् कहते हैं। इसके बाद नए कपड़े और पटाखे होते हैं, और कुछ घरों में धनतेरस पर बनाई गई औषधीय तैयारी मरुंदु सूर्योदय से पहले खाई जाती है।
- कर्नाटक और महाराष्ट्र
- दीपावली भोर के तेल-स्नान, आरती और पटाखों से शुरू होती है और बलि पाड्यमी या पाडवा तक चलती है।
- उत्तर भारत
- यहाँ यह दिन रूप चौदस कहलाता है। स्त्रियाँ सुंदरता और शुद्धि के लिए सूर्योदय से पहले उबटन लगाकर स्नान करती हैं।
- गुजरात
- भूत-प्रेत से रक्षा के लिए हनुमान जी की पूजा होती है, क्योंकि माना जाता है कि काली चौदस की रात ये शक्तियाँ घूमती हैं।
- बंगाल
- यह दिन भूत चतुर्दशी है। परिवार अपने पूर्वजों के लिए घर के चारों ओर चौदह दीये रखते हैं, ताकि कोई कोना अँधेरा न रहे।
अलग-अलग क्षेत्रों में नाम
एक ही तिथि भारत के अलग-अलग हिस्सों में अलग नामों से जानी जाती है, और कभी-कभी इसके अनुष्ठान भी अलग होते हैं। काली चौदस खास तौर पर सूर्योदय से नहीं, आधी रात की तिथि से तय होती है, इसलिए यह तेल-स्नान से एक दिन पहले भी पड़ सकती है।
- छोटी दिवाली: अधिकतर वर्षों में दिवाली की मुख्य रात से पहले की शाम, उत्तर भारत में सबसे प्रचलित नाम।
- रूप चौदस या रूप चतुर्दशी: उत्तर भारत के कुछ भागों में उबटन से होने वाले सौंदर्य-स्नान का नाम।
- नरक चौदस या नरक निवारण चतुर्दशी: ऐसे नाम जो नरक से मुक्ति पर ज़ोर देते हैं।
- काली चौदस: गुजरात और राजस्थान में इस दिन और इसकी रात की पूजा का नाम।
- भूत चतुर्दशी: बंगाल में काली पूजा से पहले की रात।
- दीपावली भोगी: दक्षिण के कुछ भागों में प्रचलित नाम।
अभ्यंग स्नान
अभ्यंग का अर्थ है तेल से शरीर का लेपन, और स्नान यानी नहाना। इसमें सबसे अहम है समय: स्नान तब किया जाता है जब चंद्रमा अभी आकाश में हो, सूर्योदय से पहले, और चतुर्दशी तिथि चल रही हो।
परंपरा से तिल का तेल ही लिया जाता है, जिसे सिर और शरीर पर मलकर उबटन लगाया जाता है और फिर गुनगुने जल से स्नान किया जाता है। मान्यता है कि यह स्नान व्यक्ति को नरक से बचाता है। बहुत से परिवार यह भी मानते हैं कि उबटन दरिद्रता और दुर्भाग्य को दूर रखता है।
स्नान के बाद का क्रम भी इसी रीति का हिस्सा है। परिवार के लोग नए कपड़े पहनते हैं, और दक्षिण भारत व गोवा के कई घरों में स्त्रियाँ बाकी परिवार की आरती उतारती हैं। इसके बाद आमतौर पर मंदिर जाकर दर्शन किए जाते हैं और रिश्तेदारों के साथ भरपूर नाश्ता होता है।
बहुत से माध्व परिवार भोर में देवता के आगे दीया जलाते हैं और किसी के स्नान करने से पहले केशव नामों से अर्चना करते हैं। शोक के वर्ष में कुछ परिवार नए कपड़े और मिठाइयाँ छोड़ देते हैं, पर तेल-स्नान और देवता को अर्पण फिर भी करते हैं।
दिवाली की अमावस्या और प्रतिपदा को भी तेल-स्नान की सलाह दी जाती है, पर इन तीनों में चतुर्दशी का स्नान सबसे महत्वपूर्ण माना जाता है। परिवार के बुज़ुर्ग या अस्वस्थ सदस्य इसे सरल रख सकते हैं: सिर पर थोड़ा तेल और गुनगुने जल से स्नान पर्याप्त है।
नरक चतुर्दशी (छोटी दिवाली) की तिथियाँ
| दिन | तारीख |
|---|---|
| रविवार | 8 नवंबर 2026 |
| गुरुवार | 28 अक्टूबर 2027 |
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अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न
नरक चतुर्दशी को छोटी दिवाली क्यों कहते हैं?
अधिकतर वर्षों में यह लक्ष्मी पूजा, यानी दिवाली की मुख्य रात, से एक दिन पहले आती है, और दीये व पटाखे छोटे पैमाने पर शुरू हो जाते हैं। इसीलिए इसे छोटी दिवाली कहा जाता है। कुछ वर्षों में, जब चतुर्दशी और अमावस्या एक ही दिन मिल जाती हैं, यह लक्ष्मी पूजा के दिन ही पड़ती है।
क्या काली चौदस और नरक चतुर्दशी एक ही हैं?
दोनों की तिथि चतुर्दशी ही है, पर ये अलग-अलग अनुष्ठान हैं। काली चौदस, जो मुख्य रूप से गुजरात में मनाई जाती है, आधी रात की तिथि से तय होती है, जबकि नरक चतुर्दशी का स्नान सूर्योदय से पहले की तिथि से तय होता है। इसलिए दोनों एक ही दिन भी पड़ सकती हैं और लगातार दो दिनों में भी।
नरकासुर का वध किसने किया था?
श्रीकृष्ण ने, और इस युद्ध में सत्यभामा उनके साथ लड़ीं। इस विजय से वे सोलह हज़ार स्त्रियाँ मुक्त हुईं जिन्हें नरकासुर ने बंदी बना रखा था, और यह दिन नरक चतुर्दशी के रूप में याद किया जाता है।
क्या अभ्यंग स्नान सूर्योदय के बाद किया जा सकता है?
यह अनुष्ठान विशेष रूप से चतुर्दशी तिथि में भोर से पहले के स्नान का है, और परंपरा में इसका पुण्य उसी समय से जुड़ा है। अगर यह समय निकल जाए, तो सुबह जल्दी तेल-स्नान और श्रीकृष्ण की प्रार्थना से भी दिन अच्छी तरह मनाया जा सकता है।
नरक चतुर्दशी के स्नान में कौन सा तेल लगाया जाता है?
परंपरा से तिल का तेल, जिसे गुनगुना करके सिर और शरीर पर मला जाता है। कुछ परिवार औषधीय तेल भी लेते हैं, और दक्षिण भारत के कई घरों में तेल पहले देवता को अर्पित किया जाता है।
क्या तमिलनाडु में नरक चतुर्दशी ही दीपावली है?
हाँ। तमिलनाडु में परंपरा से दीपावली नरक चतुर्दशी की सुबह ही मनाई जाती है, तेल-स्नान, नए कपड़ों और पटाखों के साथ। देश के बाकी अधिकतर भागों में दीपावली इसके बाद आने वाली अमावस्या की रात मनाई जाती है।
नरक चतुर्दशी कब है?
नरक चतुर्दशी कृष्ण पक्ष की चतुर्दशी तिथि को मनाई जाती है। इसका मुख्य अनुष्ठान, अभ्यंग स्नान, उस दिन होता है जब सूर्योदय से पहले चतुर्दशी तिथि चल रही हो। इस वर्ष की तारीख और स्नान का मुहूर्त इस पेज के ऊपर दिया गया है।
नरक चौदस, रूप चौदस और छोटी दिवाली में क्या अंतर है?
ये एक ही तिथि के अलग-अलग नाम हैं। छोटी दिवाली उत्तर भारत का सबसे प्रचलित नाम है, रूप चौदस उबटन से होने वाले सौंदर्य-स्नान पर ज़ोर देता है, और नरक चौदस नरक से मुक्ति पर। काली चौदस इनसे अलग है: यह आधी रात की तिथि से तय होती है, इसलिए कभी-कभी तेल-स्नान से एक दिन पहले पड़ जाती है।
भूत चतुर्दशी क्या है?
बंगाल में यही दिन भूत चतुर्दशी कहलाता है, जो काली पूजा से पहले की रात है। इस दिन परिवार अपने पूर्वजों के लिए घर के चारों ओर चौदह दीये रखते हैं, ताकि कोई कोना अँधेरा न रहे।


