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गोवत्स द्वादशी 2026: तिथि और पूजा समय

गुरुवार, 5 नवंबर 2026

गोवत्स द्वादशी 2026: 5 या 6 नवंबर?

गोवत्स द्वादशी 2026 गुरुवार, 5 नवंबर को है। उज्जैन में द्वादशी तिथि 5 नवंबर को प्रदोष काल (सूर्यास्त के बाद का समय) में रहती है। 6 नवंबर को यह सुबह 10:31 बजे, सूर्यास्त से पहले, समाप्त हो जाती है।

गोवत्स द्वादशी का महत्व

गोवत्स नाम दो संस्कृत शब्दों से बना है: गो यानी गाय, और वत्स यानी उसका बछड़ा। द्वादशी चंद्र मास की बारहवीं तिथि है। इस दिन गाय को गौ माता के रूप में पूजा जाता है, वह माँ जो पूरे घर का पोषण करती है। उसकी पूजा बछड़े के साथ होती है।

यह पर्व कृष्ण पक्ष की द्वादशी को, धनतेरस से एक दिन पहले आता है। महाराष्ट्र में इसे वसु बारस कहते हैं और दिवाली का पहला दिन मानते हैं। बहुत से घरों में दिवाली की पहली रंगोली इसी दिन बनती है और साँझ ढलते ही पहले दीये जलाए जाते हैं।

माताएँ अपनी संतान के अच्छे स्वास्थ्य और लंबी आयु की कामना से यह व्रत रखती हैं। किसान परिवारों के लिए यह अपने पशुधन को धन्यवाद देने का दिन है, क्योंकि बैल सालभर हल खींचते हैं और गाय दूध देती है।

गोवत्स द्वादशी की कथा

मान्यता है कि मनोकामना पूरी करने वाली गाय कामधेनु समुद्र मंथन से प्रकट हुई थीं। उनकी पुत्री नंदिनी महर्षि वसिष्ठ के आश्रम में रहती थीं और उनके यज्ञ-अनुष्ठानों और अतिथि-सत्कार की हर आवश्यकता पूरी करती थीं। गोवत्स द्वादशी पर गाय-बछड़े की पूजा को नंदिनी की, और उनके रूप में हर गाय की पूजा माना जाता है। कुछ परिवार यह भी मानते हैं कि इस दिन गाय में माँ लक्ष्मी का वास होता है।

भविष्य पुराण से जुड़ी एक कथा में एक युवा रानी अपने पशुओं की उपेक्षा करती थी, और उसका पुत्र बीमारी से चल बसा। शोक में डूबी रानी ने देखा कि गायें भी अपने बछड़ों के लिए विलाप कर रही हैं, तब उसने देवताओं से सहायता माँगी। उसने इसी द्वादशी को नंदिनी व्रत रखा और हर पशु की सेवा का संकल्प लिया। तब नंदिनी ने उसके पुत्र को फिर से जीवनदान दिया।

गोवत्स द्वादशी की पूजा विधि

  1. द्वार तैयार करें सुबह देहरी झाड़-बुहारकर वहाँ रंगोली बनाएँ। शाम के लिए कुछ दीये अलग रख लें।
  2. व्रत आरंभ करें व्रत रखने वाली स्त्रियाँ दिनभर गेहूँ और गाय के दूध से बनी हर चीज़ का त्याग करती हैं, दही और घी का भी। यह नियम कितनी कड़ाई से निभाया जाए, यह हर परिवार में अलग होता है।
  3. गाय के पास जाएँ, या प्रतिमा रखें घर की, पड़ोस की या किसी गौशाला की गाय के पास जाएँ। आसपास गाय न हो तो मिट्टी या धातु की गाय-बछड़े की छोटी प्रतिमा रखें, या गायों के बीच खड़े श्रीकृष्ण का चित्र रखें।
  4. गाय को स्नान कराएँ और तिलक लगाएँ पूजा ऊपर दिए गए प्रदोष काल में करें। गाय को नहलाएँ, या कम से कम उसके खुर धोएँ, और गाय तथा बछड़े दोनों के माथे पर हल्दी और कुमकुम लगाएँ।
  5. पूजन सामग्री अर्पित करें गाय को माला पहनाएँ और फूल, जल, अक्षत (साबुत चावल), धूप और जलता दीपक अर्पित करें। कुछ घरों में उसकी पीठ पर एक कपड़ा भी ओढ़ाया जाता है।
  6. गाय को खिलाएँ हरी घास, थोड़ा गुड़ और भीगा हुआ अनाज, जैसे मूँग या बाजरा, खिलाएँ। ऐसी कोई चीज़ कभी न दें जिससे पशु बीमार पड़ सकता हो।
  7. आरती और परिक्रमा दीपक से आरती उतारें, फिर धीरे-धीरे गाय की परिक्रमा करें और उसके पिछले पैरों से अच्छी दूरी रखें। अपनी संतान के लिए आशीर्वाद माँगें।
  8. दीये जलाएँ और व्रत खोलें दिवाली की शुरुआत पर द्वार पर जलते दीये रखें। व्रत ऐसे भोजन से खोलें जिसमें गेहूँ या दूध न हो, जैसे बाजरे की भाकरी और कोई सब्ज़ी।

गोवत्स द्वादशी पूजा सामग्री

  • आसपास गाय न हो तो मिट्टी या धातु की गाय-बछड़े की प्रतिमा, या चित्र
  • हल्दी
  • कुमकुम
  • अक्षत (साबुत चावल)
  • फूल और माला
  • तेल का दीपक और बाती
  • अगरबत्ती
  • जल से भरा कलश या लोटा
  • ताज़ी हरी घास
  • भीगी हुई मूँग या बाजरा
  • गुड़
  • गाय को ओढ़ाने के लिए कपड़ा (वैकल्पिक)
  • रंगोली के रंग
  • द्वार के लिए दीये
  • शाम की भाकरी के लिए बाजरे का आटा

क्षेत्रीय परंपराएँ

महाराष्ट्र
वसु बारस से यहाँ दिवाली सप्ताह शुरू होता है। माताएँ व्रत में गेहूँ और दूध से बनी चीज़ें नहीं लेतीं और शाम को गाय की पूजा होती है।
गुजरात और उत्तर भारत के कुछ हिस्से
यहाँ इसे वाघ बारस कहा जाता है और यह कर्ज़ चुकाने का दिन है। व्यापारी अपने खाते बंद कर देते हैं और नई बहियाँ खुलने तक कोई नई प्रविष्टि नहीं करते।
आंध्र प्रदेश
पीठापुरम के दत्त महासंस्थान में यह दिन श्रीपाद श्रीवल्लभ के सम्मान में श्रीपाद वल्लभ आराधना उत्सव के रूप में मनाया जाता है।
ग्रामीण भारत
कुछ गाँवों में परिवार मिट्टी या गारे से गाय और बछड़े की आकृतियाँ बनाते हैं और पूजा के लिए उन्हें सजाते हैं।
दक्षिण भारत
दक्षिण भारत के कुछ हिस्सों में यह दिन गोवत्स द्वादशी के नाम से ही जाना जाता है, और कुछ परिवार इससे जुड़ा नंदिनी व्रत रखते हैं।

महाराष्ट्र में वसु बारस

मराठी घरों में दिवाली की शुरुआत वसु बारस से होती है। घर की सफ़ाई होती है, बहुत से परिवार दरवाज़े पर साल की पहली दिवाली रंगोली बनाते हैं और सूर्यास्त के बाद दीयों की कतार जलाते हैं।

यह व्रत अधिकतर माताएँ रखती हैं। पूजा पूरी होने तक वे गेहूँ, दूध, दही और घी नहीं लेतीं। परिवारों में कहा जाता है कि इस दिन गाय का दूध उसके अपने बछड़े के लिए होता है। बहुत से घरों में पूजा के बाद का भोजन बाजरे की भाकरी होता है, जिसके साथ ग्वार की फली और मूँग परोसी जाती है।

गाँवों में परिवार शाम को अपनी गायों को नहलाते हैं, माला पहनाते हैं और तिलक लगाते हैं। शहरों में अक्सर गाय-बछड़े की छोटी प्रतिमा उनकी जगह ले लेती है, और बहुत से लोग अपनी जानी-पहचानी गौशाला में दान देते हैं।

नंदिनी व्रत

गोवत्स द्वादशी को नंदिनी व्रत के रूप में भी मनाया जाता है, जिसका नाम कामधेनु की पुत्री नंदिनी के नाम पर पड़ा है। स्त्रियाँ इसे अपनी संतान के कल्याण के लिए उपवास के रूप में रखती हैं।

कथा में रानी से कहा जाता है कि वह हर गाय का सम्मान कामधेनु की तरह करे। शाम की पूजा में अक्सर श्रीकृष्ण के गौ-प्रेम के भजन गाए जाते हैं।

गोवत्स द्वादशी की तिथियाँ

गोवत्स द्वादशी की तिथियाँ
दिनतारीख
गुरुवार5 नवंबर 2026
मंगलवार26 अक्टूबर 2027

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अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न

गोवत्स द्वादशी 2026 का समय क्या है?

गोवत्स पूजा (प्रदोष काल): शाम 5:43 – रात 8:18। समय उज्जैन के लिए IST में हैं।

गोवत्स द्वादशी कब है और किस तिथि को मनाई जाती है?

गोवत्स द्वादशी कृष्ण पक्ष की द्वादशी तिथि को, धनतेरस से एक दिन पहले मनाई जाती है। इस वर्ष की तारीख़ और पूजा का समय इसी पेज के ऊपर दिया गया है।

क्या वसु बारस दिवाली का पहला दिन है?

महाराष्ट्र में हाँ। मराठी परिवार धनतेरस से एक दिन पहले, वसु बारस से अपनी दिवाली शुरू करते हैं, और बहुत से घरों में उसी शाम त्योहार के पहले दीये जलते हैं।

क्या वसु बारस, गोवत्स द्वादशी और वाघ बारस एक ही हैं?

तीनों नाम एक ही दिन के हैं। गोवत्स द्वादशी इसका संस्कृत नाम है और वसु बारस मराठी नाम। गुजरात में इसे वाघ बारस कहते हैं और इस दिन पुराने हिसाब चुकता किए जाते हैं।

गोवत्स द्वादशी की पूजा किस समय करें?

गाय और बछड़े की पूजा शाम को प्रदोष काल में की जाती है। इस वर्ष के प्रदोष काल का समय इसी पेज पर ऊपर दिया गया है।

गोवत्स द्वादशी पर माताएँ गेहूँ और दूध क्यों नहीं खातीं?

यह इस व्रत की पुरानी परंपरा है। परिवार आमतौर पर कहते हैं कि इस दिन दूध बछड़े का होता है, इसलिए व्रत रखने वाली माँ उसे नहीं लेती। हर परिवार अपनी परंपरा का पालन करता है।

गोवत्स द्वादशी के व्रत में क्या खाएँ?

व्रत में गेहूँ और गाय के दूध से बनी चीज़ें नहीं ली जातीं, दही और घी भी नहीं। बहुत से घरों में व्रत बाजरे की भाकरी और सब्ज़ी से खोला जाता है, साथ में ग्वार की फली और मूँग।

क्या गाय के बिना गोवत्स द्वादशी की पूजा कर सकते हैं?

हाँ। घर पर गाय-बछड़े की छोटी प्रतिमा, या गायों के साथ श्रीकृष्ण के चित्र को वही सब अर्पित किया जा सकता है। किसी गौशाला में दान देना भी इस दिन को मनाने का एक तरीका है।

वसु बारस पर गाय को क्या खिलाना चाहिए?

आमतौर पर हरी घास, भीगी मूँग या बाजरा, चना और थोड़ा गुड़ खिलाया जाता है। कुछ परिवार गाय को गेहूँ से बना पकवान भी देते हैं। ध्यान रखें कि खाना गाय के लिए सुरक्षित हो।

क्या रमा एकादशी और गोवत्स द्वादशी एक ही दिन पड़ सकती हैं?

हाँ, ऐसा तब होता है जब सूर्योदय के समय एकादशी हो और द्वादशी उसी दिन बाद में लगे। जो परिवार दोनों व्रत रखते हैं, वे भोजन के नियमों के लिए आमतौर पर अपने पंचांग का पालन करते हैं।

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